बुधवार, 29 सितंबर 2010

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या

तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संसृति

भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या!

तेरा मुख सहास अरुणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय

खेलखेल थकथक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या!

तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला,
तेरा ही मानस मधुशाला

फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या!

रोमरोम में नंदन पुलकित
साँससाँस में जीवन शतशत
स्वप्न स्वप्न में विश्व अपरिचित

मुझमें नित बनते मिटते प्रिय
स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या!

हारूँ तो खोऊँ अपनापन
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूँ तेरा ही बंधन

भर लाऊँ सीपी में सागर
प्रिय मेरी अब हार विजय क्या!

चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम

काया छाया में रहस्यमय
प्रेयसि प्रियतम का अभिनय क्या!

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या


- महादेवी वर्मा

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है


- हरिवंश राय बच्चन

रविवार, 26 सितंबर 2010

मधु ऋतू

घोल दिया मधुऋतू ने अपना सब माधुर्य
अपनी सब मादकता अपना सब सौन्दर्य
एक एक कोपल में कलिका में फूल में
जीवन नव थिरक उठा , जीवन नव उबल उठा
एक एक डाली पर छा गयी लुनाई तरुण
एक एक कली शरमाई सौन्दर्य से
एक एक फूल फूल उठा रूप गर्व से
फूट पड़ी कान्ति किरण आतुर सौन्दर्य की
हँसते मुस्काते फूल हस्ते मुस्काते नयन
बोल रहे मनो कुछ मुखरित मौन में
करती स्पष्ट पिकी -- पिऊ कहाँ ! पिऊ कहाँ !
उत्तर में आते तत्काल भ्रमर गुंजन -रत
मधुऋतू जब बरस पड़ी क्रमबद्ध तालबद्ध
फिर भी कलियों का दोष ! फिर भी भ्रमरों का दोष !

लेखक - डॉ कृपा शंकर अवस्थी

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।


- रामधारी सिंह दिनकर

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

कोशिश करने वालों की

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

- हरिवंशराय बच्चन

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

दयालुता की मृत्यु

जानी पहचानी बाज़ार में
सब दिन सी शाम आज भी
सब दिन सी भीड़ आज भी
करों की इस रेल पेल में
सड़क दौड़ती सी कुछ लगती
जगमग करती सभी दुकाने
और वहीं पटरी पर यह क्या ?
यहाँ पड़ी है गाय एक
जो तड़प चुकी दम तोड़ रही
हड्डी हड्डी ऊपर निकली
गर्दन पीछे घूम गयी है
बड़ी बड़ी दो आँखें
जिनमें द्रष्टि नहीं
निकली सी पड़ती
शीशे जैसी चमक रही हैं
एक पैर अब भी हिलता कुछ
उसी पैर से सटी हुयी
बैठी उसकी छोटी बछिया
शायद बैठी सोच रही हो
मेरी गैय्या, मेरी मैय्या
सोई गहरी नींद आज
बस आब उठती
अब दूध पिलाती
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कल कुछ नहीं वहां पर होगा
पर अवश्य ही मेरे मन पर
एक लकीर खिचीं पत्थर की
जो चिल्ला कर कहती रहती
तुम जिसको ईश्वर कहते हो
उसमें दया कृपा बस उतनी
जितनी दया कृपा बिजली में
और आणुविक उर्जा में
और कहूँ क्या गौभक्तों को
बन्दे खुदा को , ईशा की करुना वालों को
एक नज़र भी नहीं किसी ने देखा यह सब
करना तो बहुत दूर
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मैंने आज दांत पीसे हैं
आपने लाखों हमवतनो पर
चलो आज हो गया फैसला
आज शाम को दया मर गयी
और दयामय की दयालुता
बन बैठा है उनका वारिस
चट्टानी कर्त्तव्य वज्र सा
फौलादी कर्त्तव्य वज्र सा
जो उतना निश्दुर सशक्त
जितनी उर्जा , जितना ईश्वर
लेखक : डॉ० कृपा शंकर अवस्थी


मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

तुम प्रणय पुष्प और मैं गुंजन


तुम प्रणय पुष्प और मैं गुंजन
तुम अमृत रस मैं 'प्यासा मन'
मेरी तृष्णा बेकल-बेकल
तुम सरिता सी चंचल चंचल
इस सागर तक तुम आ जाओ
स्वीकार करो ये निमंत्रण
तुम प्रणय पुष्प और मैं गुंजन तुम
ग़ज़ल हो या हो ताजमहल
जो तुम्हें निहारे पल दर पल
मुझसे भी ज्यादा खुशकिस्मत
वो काँच का टुकड़ा, वो दरपन
तुम प्रणय-पुष्प और मैं गुंजन
तुम प्रीत का कोई गीत कहो
कभी मुझको भी मनमीत कहो
मुझा से न सही मेरी कविता से
इक बार तो कर लो आलिंगन
तुम प्रणय पुष्प और मैं गुंजन
ये मन है स्वप्न सजाता है
कभी रोता है कभी गाता है
इस मन की बात समझ लो तुम
बांधो न भले कोई बंधन
तुम प्रणय पुष्प और मैं गुंजन

लेखक : श्री विलास पंडित 'मुसाफिर'

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

आगाज़

आज मैं आपना ब्लॉग श्री हरीवंश रॉय बच्चन जी की इन पंक्तियों के द्वारा शुरू कर रहा हूँ

वृक्ष हो भले खड़े,हो घने, हो बड़े,एक पत्र छाँह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ

तू थकेगा कभी,तू थमेगा कभी,तू मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ

यह महान दृश्य है,चल रहा मनुष्य है,अश्रु, स्वेद, रक्त से,

लथपथ, लथपथ, लथपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ